गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

हिंदी दिवस पर भाषा चिंतन

सितंबर का महीना हम हिंदी प्रचारकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसी महीने में ‘हिंदी दिवस ’ मनाया जाता है. ‘स्रवंति ’ की ओर से आपको ‘हिंदी दिवस ’ की शुभकामनाएँ देते हुए हम यहाँ एक सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘हिंदी भाषा चिंतन ’ की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करेंगे.


भाषा के बारे में विवेचन - विश्लेषण वस्तुतः भाषा से ही होता है. अतः भाषा साध्य भी है और साधन भी. यह सर्वविदित है कि हिंदी भाषा के विकास, मानकीकरण,आधुनिकीकरण और सुनिश्चित व्याकरणिक संरचना की एक सुदृढ़ परंपरा रही है. हिंदी भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन ही ‘हिंदी भाषाविज्ञान ’ है. भाषाविज्ञान भाषा के व्याकरणिक सम्मत, शुद्ध तथा मानक रूप को अध्ययन सामग्री बनाता है, लेकिन सामाजिक व्यवहार में भाषा समरूपी न होकर विषमरूपी होती है. एक ओर समाज में भाषा के शैली भेद उपलब्ध हैं तो दूसरी ओर इसकी विविध बोलियाँ और सामाजिक व्यवहार के अनेकानेक विकल्प.


मानकीकरण की दृष्टि से हिंदी भाषा की लिपि से लेकर के उसके व्याकरणिक ढ़ाँचे तक के महत्वपूर्ण पक्षों पर महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा अनेकानेक विद्वानों ने समय समय पर विचार प्रकट किए हैं. साथ ही हिंदी भाषा के शक्ति सामर्थ्य से संबंधित अनेक गुत्थियों को भी सुलझाया गया. विश्व फलक पर उभर रहे भाषाई चिंतन से हिंदी भाषाविज्ञान को जोड़ने में डॉ.धीरेंद्रवर्मा का योगदान अनुपमेय है. उन्होंने हिंदी भाषा की ऐतिहासिकता तथा उसकी बोलीगत, क्षेत्रगत एवं प्रयोगगत संभावनाओं का भी सूक्ष्म अध्ययन प्रस्तुत किया है. इस परंपरा को आगे बढ़ाने में अनेक भाषाविदों ने योगदान किया है और हिंदी भाषा चिंतन के विविध पक्षों को पुष्ट किया है. इस संदर्भ में प्रो.दिलीप सिंह (1951) की कृति ‘हिंदी भाषा चिंतन ’(2009, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) मूलतः हिंदी भाषा विषयक विमर्श के एक नए आयाम प्रस्तुत करती है.


प्रो.दिलीप सिंह ने अपने इस ग्रंथ में हिंदी भाषा के विकास का भाषावैज्ञानिक विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत किया है. उनकी मान्यता है कि
"हिंदी भाषा के रचनाकारों, पोषकों, अनुवादकों (चाहे वे किसी प्रांत या क्षेत्र के हों) ने हिंदी भाषा के भीतर विशाल जन-जीवनों की आत्मा से बराबर तालमेल बनाए रखा है. इनको अब हिंदी व्याकरण में उकेरने होगा. बनावटी, अनुवाद आश्रित, जन-संपर्क से दूर होती जा रही सामर्थ्यहीन हिंदी का तिरस्कार करना भी इस व्याकरण के लिए ज़रूरी होगा. भाषा की शुद्ध्ता या मानकता की दुहाई देकर हिंदी भाषा के स्वाभाविक विकास और प्रयोग को; कहा जाय उसकी लचीली प्रकृति या ग्रहणवादी प्रकृति की आलोचना करनेवाले शुद्धतावादियों से सावधान रहे बिना और भाषा-संपर्क एवं भाषा-विकास की स्वाभाविक व्याकरणिक परिणतियों का संकेत दिए बिना हिंदी व्याकरण की परतों (layers) को नहीं टटोला जा सकता है. हिंदी भाषा मात्र, ‘एक ’ व्याकरणिक व्यवस्था नहीं है, वह हिंदी भाषा समुदाय में व्यवस्थाओं की व्यवस्था के रूप में प्रचलित और प्रयुक्त है; इस तथ्य के प्रकाश में निर्मित हिंदी-व्याकरण ही भाषा के उन उपेक्षित धरातलों पर विचार कर सकेगा जो वास्तव में भाषा प्रयोक्ता के ‘भाषाई कोष ’ की धरोहर हैं. कोई भी जीवंत शब्द और जीवंत भाषा एक नदी की तरह विभिन्न क्षेत्रों से गुजरती और अनेक रंग-गंधावली मिट्टी को समेटती आगे बढ़ती है. हिंदी भी ऐसी ही जीती - जागती भाषा है. इसके व्यावहारिक विकल्पों को व्याकरण में उभारना, यही एक तरीका है कि हम हिंदी को उसकी राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय भूमिका में आगे ले जा सकते हैं."


लेखक ने प्रथम खंड ‘धरोहर’ के अंतर्गत हिंदी के शब्द संस्कार की व्यापकता की चर्चा करते हुए यह बात स्पष्ट की है कि डॉ.रघुवीर के पारिभाषिक शब्दावली कोश पर पुनर्विचार की आवश्यकता है ताकि जिन शब्द सूचियों की मदद अक्सर ली जाती हैं, उनकी रचना और बनावट को पुनः रेखांकित किया जा सके तथा उन्हें अधिक व्यावहारिक बनाया जा सके. हिंदी की सामासिक संस्कृति पर विचार करते हुए लेखक ने यह रेखांकित किया है कि भाषा शिक्षण की सहायक सामग्री के रूप में व्याकरण एक अनिवार्य तत्व है. उनका मत है कि आज व्यावहारिक अथवा संप्रेषणपरक व्याकरण की आवश्यकता है जिसके सहारे हिंदी भाषा की वैविध्यपूर्ण प्रकृति अथवा उसकी सामाजिक यथार्थता को उद्‍घाटित किया जा सके. उच्चरित और लिखित भाषा के अंतःसंबंधों एवं देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता की चर्चा भी की गई है. इस खंड में लेखक ने भाषाविज्ञान के विकास में महिलाओं के योगदान का भी विवेचन किया है जो स्त्रीविमर्श को नया आयाम प्रदान करता है तथा संभवतः अपनी तरह का इकलौता सर्वेक्षण है.


दूसरे खंड ‘हिंदी का सामाजिक संदर्भ ’ के अंतर्गत ‘समाज भाषाविज्ञान ’ के सैद्‌धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों पर दृष्टि केंद्रित की गई है. भाषिक क्षमता और भाषिक व्यवहार की चर्चा करते हुए आधुनिक भाषा अध्ययन के अनेक दृष्टिकोणों तथा अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की भिन्न शाखाओं का परिचय कराया गया है. साथ ही समाज में व्यवहृत भाषा रूपों अर्थात्‌ पिजिन, क्रियोल, कोड मिश्रण, कोड परिवर्तन और भाषा द्वैत की संकल्पनाओं को स्पष्ट किया गया है.


तीसरे खंड में मानकीकरण और आधुनिकीकरण की संकल्पनाओं की चर्चा करते हुए लेखक ने यह प्रतिपादित किया है कि यदि मानकीकरण के प्रयासों के साथ उसकी संभावनाओं पर दृष्टि केंद्रित करनी है तो उसके खतरों से भी अवगत होना जरूरी है.


चौथे खंड में भाषा विकास की चर्चा करते हुए लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि दक्खिनी हिंदी वसतुतः हिंदी के विकास की मजबूत कड़ी है. उन्होंने यह रेखांकित किया है कि
"दक्खिनी हिंदी काव्य भाषा भारत की सामासिक संस्कृति का एक अनुकरणीय स्वरूप लेकर हमारे सामने आज भी एक जीवंत और ज्वलंत प्रमाण के रूप में उपस्थित है."
उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया है कि ‘हिंदी और उर्दू को टुकड़ों में, खेमों में या खानों में विभाजित करना बेमानी है. ’


प्रयोजनमूलक हिंदी वस्तुतः आज की जरूरत है. पांचवे खंड में प्रयोजनमूलक हिंदी की प्रयुक्तियों एवं उप-प्रयुक्तियों की स्वरूपगत विशेषताओं को समझाते हुए लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि प्रयोजनमूलक हिंदी के संदर्भ में अधिकांश अध्ययन और विवेचन ‘कार्यालयीन हिंदी ’ तक ही सीमित हो गए हैं. लेकिन वास्तव में प्रयोजनमूलक हिंदी जीवन और समाज की विभिन्न आवश्यकताओं एवं दायित्वों की पूर्ति के लिए उपयोग में लाए जानेवाली हिंदी है. छठे खंड में प्रयोजनमूलक हिंदी की विविध शैलियों के अंतर्गत व्यावसायिक हिंदी की चर्चा करते हुए लेखक ने पत्रकारिता की हिंदी और साहित्य समीक्षा के साथ साथ पाक-विधि की प्रयुक्ति का सोदाहरण विवेचन किया है. इसमें संदेह नहीं कि समीक्षा से रसोई तक रस परिपाक का आधार भाषा ही है और इस कृति में इसे अत्यंत रोचक ढ़ंग से उद्‌घाटित किया गया है.


सातवें और अंतिम खंड में लेखक ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के योगदान को स्पष्ट किया है. यह सर्वविदित है कि स्वतंत्रता संघर्ष में हिंदी राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में उभरी. इसलिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का प्रतीक चिह्‌न हृदयों को जोड़ता हुआ यह घोषित करता है -
"एक राष्ट्रभाषा हिंदी हो, एक हृदय हो भारत जननी."
1918 में स्थापित सभा का मुख्य उद्‍देश्य था, हिंदी का प्रचार - प्रसार. राष्ट्रपिता माहात्मा गांधी इस संस्था के आजीवन अध्यक्ष रहे. 1927 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा एक स्वतंत्र संस्था के रूप में उभरी और 1964 में ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था ’ बनी. इसी वर्ष मद्रास में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान (विश्‍वविद्‍यालय विभाग) प्रारंभ हुआ. तब से लेकर आज तक सभा अपने उद्‍देश्‍यों को क्रियान्वित कर रही है. उच्च शिक्षा और शोध संस्थान ने व्यावहारिक हिंदी के पाठ्‍यक्रमों में एम.ए. स्तर पर साहित्य के साथ साथ शैलीविज्ञान, सौंदर्यशास्त्र, सामान्य भाषाविज्ञान, हिंदी भाषा की संरचना और इतिहास ही नहीं कार्यालयीन हिंदी, व्यावसायिक हिंदी, अनुवाद विज्ञान, तुलनात्मक अध्ययन, व्यतिरेकी विज्ञान तथा अन्य भाषा शिक्षण जैसे प्रयोजनमूलक हिंदी के प्रश्‍न पत्र भी शामिल किए हैं. इस प्रकार के ‘जॉब ओरियंटेड ’ पाठ्‍यक्रम छात्रों को रोजगार प्राप्त कराने में सक्षम हैं. इस प्रकार हिंदी के प्रचार - प्रसार के साथ साथ उच्च शिक्षा और शोध कार्यों के माध्यम से निरंतर एक नई पीढ़ी को तैयार कर रही है ताकि हिंदी अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त कर सकें.


यह निर्विवाद है कि भारत और भारतीय संस्कृति को समझने में हिंदी की अहम भूमिका है. हिंदी ने संपूर्ण विश्‍व का ध्यान अपनी ओर खींच रखा है. प्रो.दिलीप सिंह ने अपनी पुस्तक द्वारा विश्‍व भाषा के रूप में हिंदी की शक्ति का भी बोध कराया है. उन्हीं के एक कथन के साथ इस चर्चा का समाहार समीचीन होगा -

"हम भारत के लोग विदेशों में हो रहे हिंदी संबंधी कार्यों को भी अनदेखा किए हुए हैं. इन्हें न तो हम कोई पहचान देते हैं और न ही महत्व. इस तरह की उदासीनता को सक्रिय जागरूकता में बदले बिना हिंदी भाषा (साथ ही विदेशों में चल रहे तमिल, तेलुगु, बांग्‍ला भाषा कार्यक्रमों को भी) के अंतरराष्ट्रीय संदर्भ को वह ऊँचाई नहीं मिल सकती जिसकी आकांक्षा है, उल्टा, इस तरह की मनोवृत्ति से विदेशी भाषा के रूप में हिंद्दी भाषा की गति - प्रगति बाधित होगी, नीचे की ओर ढुलकेगी. विदेश में हिंदी का ध्वज रामायण के परिवेश में फहरा है. शायद ही दुनिया की कोई ऐसी भाषा हो जिसमें वाल्मीकी कृत ‘रामायण ’ अथवा ‘रामचरित मानस ’ का अनुवाद या व्याख्यानुवाद न हुआ हो. मीरा, सूर, कबीर भी खूब अनूदित हुए हैं. रूसी भाषा में ‘प्रेम सागर ’ (ए.पी.बारान्निकोव) का अनुवाद भी हुआ है. अपने अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में हिंदी भाषा, मात्र एक भाषा नहीं, भारतीय संस्कृति, दर्शन और अध्यात्म की संवाहिका भाषा है. इस भावात्मक लगाव के कारण ही विश्‍व का झुकाव हिंदी की ओर हुआ. हिंदी साहित्य के अनुवाद कार्य में तथा हिंदी में सृजनात्मक लेखन में इन देशों का योगदान अपना ऐतिहासिक महत्व रखता है. आज हमें इन कार्यों का अवलोकन - आकलन करते हुए इन्हें प्रोत्साहित करने और इनसे संबद्ध समस्याओं का समाधान करने का प्रयत्‍न करना चाहिए. भारत के विश्‍वविद्‍यालयों में इन कार्यों पर शोध हों, महत्वपूर्ण व्याकरणों, रचनाओं का पाठ्‍यक्रम में स्थान दिया जाय और भारत सरकार इन कार्यों को प्रकाशित कर सस्ते दामों पर उपलब्ध कराये. विश्‍व हिंदी के विस्तार को भारतीय जनता से परिचित कराने पर ही हम हिंदी - प्रेमी भारतीय का आत्म - सम्मान बढ़ेगा और विदेशों में हिंदी के लिए समर्पित प्रतिभाओं का उत्साह भी."


[सितंबर2009, संपादकीय: स्रवंति}

जो चले गए, उनको प्रणाम !

हिंदी के लोकप्रिय रंगकर्मी, निर्देशक, कवि और अभिनेता, ‘आगरा बाज़ार ’ और ‘चरनदास चोर ’ जैसे सुप्रसिद्ध नाटकों के लेखक हबीब तनवीर का निधन 08 जून, 2009 को 85 वर्ष की आयु में हुआ.

हबीब तनवीर का जन्म 01 सितंबर, 1923 को रायपुर (छत्तीसगढ़) में हुआ था. उनका मूल नाम हबीब अहमद खान था. ‘तनवीर ’ नाम से वे कविता लिखते थे. उनके द्वारा रचित नाटकों में ‘आगरा बाज़ार’, ‘शतरंज के मोहरे’, ‘मिट्टी की घड़ी’ ‘चरनदास का चोर’, ‘पोंगा पंडित’, ‘कामडे का अपना बसंत ऋतु का सपना’, ‘राजरक्त’ आदी प्रमुख हैं.

तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1969), पद्‍मश्री (1983), कालिदास सम्मान (1990),संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप(1996), तथा पद्‍मभूषण (2002), से सम्मानित किया गया था. उनके सुप्रसिद्ध नाटक ‘चरनदास चोर’ के लिए एडिनबर्ग अंतरराष्ट्रीय नाटक महोत्सव (1982) में `Fringe Firsts Award' भी प्राप्त हुआ.

तनवीर पारदर्शी तथा खुले विचारोंवाले व्यक्ति थे. उनके अनुसार अंचल ही सही अर्थों में रंगमंच है. अतः उन्होंने लोक कलाकारों को प्रोत्साहित किया और अपने थियेटर में उन्हें स्थान दिया. वे अपने नाटकों में लोक संगीत का प्रयोग करते थे, समाज में व्याप्त शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार आदि के खिलाफ आवाज उठाते थे तथा छत्तीसगढ़ी लोकशैली ‘पंडवाणी’ के साथ साथ पारंपरिक रंगमंचीय तकनीक का भी प्रयोग करते थे. उनके नाटकों में छत्तीसगढ़ी लोक परंपरा एवं छत्तीसगढ़ी नाच का प्रभाव देखा जा सकता है.

सफदर हाशमी के अनुरोध पर तनवीर ने 1980 को जन नाट्‍य मंच (जनम) के लिए ‘मोती राम का सत्याग्रह’ नामक नाटक का निर्देशन किया. नाटक निर्देशन के साथ साथ उन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया. रिचडर्स एटिनबरो की फिल्म ‘गांधी ’ (1982) में अभिनय किया. भोपाल गैस त्रासदी पर चित्रित फिल्म ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में भी उन्होंने अभिनय किया, पर यह फिल्म अभी तक रिलीज़ नहीं हुई.

रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘राजर्षि ’ तथा नाटक ‘विसर्जन ’ के आधार पर उन्होंने 2006 में ‘राजरक्त ’ नामक नाटक लिखा और उसका निर्देशन भी किया.

निध्न से पूर्व वे उर्दू में लिखित अपनी आत्मकथा ‘मटमैली चदरिया ’ को अंतिम रूप दे रहे थे.

जून माह में हमने वरिष्ठ रंगकर्मी हबीब तनवीर के साथ साथ हिंदी काव्यमंच की तीन विभूतियों - ओमप्रकाश ‘आदित्य’, लाड़सिंह गूजर और नीरज पुरी को खो दिया.

इन सब दिवंगत विभूतियों को ‘स्रवंति ’ परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि !
[जुलाई2009, संपादकीय:स्रवंति]

कुँवरनारायण

"चारों ओर लौह - मौन गुम्बद - सा अंधकार
जिसकी दीवारों से टकराती आवाजें ये
केवल सन्नाटे को और झनझनाती हैं.
*** *** *** ***
समय के केंचुल सरीखा रास्ता.
मारकर खाया हुआ - सा पड़ा
चारों ओर खाली नगर - पंजर ...
लुंज दीवारें -
सहारे
डरी, सिकुड़ी पड़ी
कुछ परछाइयाँ ." (आत्मजयी)


आधुनिक समाज की जटिलताओं एवं विसंगतियों के चितेरे, हिंदी कविता के शलाका पुरुष कुँवरनारायण को वर्ष 2005 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया. नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवरनारायण ‘अज्ञेय’ द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ (1959) के प्रमुख कवियों में रहे हैं. वे अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिए वर्तमान को देखने के लिए जाने जाते हैं. कुँवरनारायण के लिए जीवन संपर्क का अर्थ अनुभव मात्र नहीं अपितु वह अनुभूति और मननशक्ति भी है जो अनुभव के प्रति तीव्र और विचारपूर्वक प्रतिक्रिया कर सके.



मानवीय सार्थकता के पक्षधर कुँवरनारायण का जन्म 1927 में हुआ. वे चुंतक मिजाज और संवेदनशील कवि हैं. उनकी कविताओं में भावनाओं का आवेग नहीं अपितु संयम है. उनकी कविता रोमांटिक भावुकताग्रस्त कविता नहीं अपितु उसमें कई की प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती नज़र आती हैं. उनकी कविता में एक प्रकार के रहस्य और विलक्षण प्रश्‍नाकुलता की मुद्रा पग पग पर दिखाई देती है. अस्तित्व को पहचानने की चिंता, अकेलापन, मनुष्य की नियति, मृत्युबोध आदि उनकी कविताओं में विशेष रूप से दीख पड़ते हैं. उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘आत्मजयी’, ‘आकारों के आसपास’, ‘चक्रव्यूह’, ‘अपने सामने’, ‘सन्नाटा या शोर’, ‘जब आदमी आदमी नहीं रह जाता’, ‘इन्तिज़ाम’, ‘दिल्ली की तरफ’, ‘शक’ आदि शामिल हैं.



कुँवरनारायण कवि होने के साथ साथ गंभीर आलोचक भी हैं. उनकी कविता का मूलाधार है - निरंतर और बेचैन प्रश्‍नाकुलता, जो किसी भी सहृदय का सहज स्वाभाव होती है. उनहोंने अपने काव्यबोध से यह प्रमाणित किया कि जो सुंदर है, वह कठिन भी है; चूँकि मानवीय हित की कल्पना सुंदर है लेकिन उसके लिए कठिनतर प्रयत्‍न ज़रूरी है. उनकी पक्षधरता विश्‍वमानवता के सामने उपस्थित संकटों की पहचान में निहित है. कठिन समय का अहसास कुँवरनारायण की कविताओं में बार बार उभरता है -
"शायद उसी मुश्किल वक्त में / जब मैं एक डरे हुए जानवर की तरह / उसे अकेला छोड़कर बच निकला था ख़तरे से सुरक्षा की ओर / वह एक फँसे हुए जानवर की तरह / खूंख्वार हो गया था." (जब आदमी आदमी नहीं रह जाता / अपने सामने).



कुँवरनारायण ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में व्याप्त त्रास्द मूल्यहीनता का निर्मम उद्‍घाटन किया है. मुक्तिबोध ने कुँवरनारायण के बारे में लिखा है -
"महत्व की बात यह है कि आज, जबकि साधारणतः लेखक और कवि इसी व्यवहार क्षेत्र में कार्यकुशल होकर अपने को अधिकाधिक सफल और प्रभावशाली बनाने के प्रयत्‍न में लीन रहते हैं और इसके लिए बिक तक जाते हैं, कुँवरनारायण ऐसा कवि है जो उसी व्यवहार क्षेत्र के विरुद्ध तीव्र संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएँ करता हुआ, जीवन के क्षण क्षण को तड़िन्मय और संवेदनमय बनाने के लिए अकुलाता हुआ, पीड़ित अंतरात्मा के स्तर को उभारता है. उसे वास्तविक मानवीय सार्थकता की तलाश है. वह वास्तविक मानवीय सार्थकता उसे कहीं नहीं मिल पाती. इसलिए उसका चित्त खिन्न हो जाता है. पर वह केवल दुःख के काले रंगों में घिरकर डूब नहीं जाता, वरन्‌ मानव के हृदय विस्तार की क्रिया में जो एक मूल समस्यात्मक बाधा है, उस बाधा के वस्तुगत रूप का भी स्पष्ट चित्रण करता है. उसका स्वर उदात्त और नैतिक महत्व धारण कर लेता है. कुँवरनारायण मूलतः आदर्शवादी कवि हैं."



वास्तविक मानवीय सार्थकता के खोजी कवि कुँवरनारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने के अवसर पर उन्हीं के कवितांश के माध्यम से ‘स्रवंति ’ परिवार की बधाई निवेदित है -


"चेतना का न्यून अंकुर,
मनुजता की सहज मर्यादा,
उपजने दो खुली, सन्तुष्ट, रस जलवायु में,
क्योंकि विकसित व्यक्ति ही वह देवता है
इतर मानव जिसे केवल पूजता है;
आँक लेगा वह पनप कर
विश्‍व का विस्तार अपनी अस्मिता में ...
सिर्फ उसकी बुद्धि को हर दासता से मुक्त रहने दो."

[स्रवंति:दिसंबर 2008 संपादकीय]

'आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे'


"कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखाएँगे,
आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे,
हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे."

- -अशफ़ाक उल्ला खाँ

भारत की आज़ादी का इतिहास अविस्मरणीय घटनाओं से भरा पड़ा है. लाखों - करोड़ों देशप्रेमियों ने जिस बहादुरी और साहस के साथ अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष किया और जिस बलिदान एवं त्याग का परिचय दिया, वह अनुपमेय है. प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था -
" वर्षों पहले हमने भाग्यवधू से एक प्रतिज्ञा की थी. आज वह क्षण आ गया है जब हम उस प्रतिज्ञा को समग्र रूप में न सही , बहुत हद तक पूरा करेंगे."

स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में 19 वीं सदी पुनर्जागरण का काल था. इसी काल में राष्ट्रीय चेतना मानवीय जिजीविषा के लिए चुनौती बनकर सामने आई, नए मूल्यों की स्थापना हुई. भारतीय साहित्य में निरंतर इन मूल्यों एवं आदर्शों का सशक्त रूप मुखरित होता रहा है.

हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय संघर्ष की विविध घटनाओं का चित्रण सहज एवं स्वाभाविक है. ब्रिटिश शासन काल में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति पर अंकुश था लेकिन साहित्यकारों ने जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाई.

राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम बापू के नेतृत्व में चरम सीमा पर पहुँचा. शांति और क्रांति दोनों के समर्थक आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन पर प्रहार किए. साहित्यकारों ने भी अपना दायित्व निभाते हुए तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक घटनाओं को रूपायित किया. उसकी समृति बाद की रचनाओं में भी अंकित हुए. उदाहरण के लिए ‘मैला आंचल ’ (1954) का एक सत्याग्रही अपने साथियों को संबोधित करते हुए कहता है -
"पियारे भाइयो, हमने भारथमाता का नाम, महतमा जी का नाम लेना बंद नहीं किया. तब मलेट्री ने हमको जेलखाना में डाल दिया. आप लोग तो जानते ही हैं कि सुराज लोग जेहल को क्या समझते हैं - ‘जेहल नहीं ससुराल यार हम बिहा करने को जाएँगे’." (मैला आंचल ; पृ.30)

1947 में भारत को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्ति तो मिली लेकिन द्विराष्ट्रवाद के कारण देश का विभाजन हुआ और भारत को सांप्रदायिकता की ज्वाला में दग्ध होना पड़ा. इस प्रकार आज संपूर्ण देश में फैली सांप्रदायिकता का बीज स्वतंत्रता पूर्व ही अंकुरित हो गया था. दूसरी ओर ‘मैला आंचल ’ में रेणु ने सांप्रदायिक एकता के उस गीत का स्मरण किया जो खिलाफत के जमाने में गाया गया था -
"अरे चमक मंदिरवा में चाँद / मसजिदवा में बंसी बजे! / मिली रहू हिंदू - मुसलमान / मान-अपमान तजो!" (मैला आंचल ; पृ.232)

इसके अलावा स्वाराज्य की कल्पना उस काल के भारतीय लोकमानस ने किस रूप में की थी, उसकी झांकी द्रष्टव्य है -
"भारत में आयल सुराज / चलु सखी देखन को... / भारथमाता / कथि जे चढ़ल सुराज / चलु सखी देखन को! / *** *** / हाथ चढ़ल आवे भारथमाता / डोली मैं बैठल सुराज! चलु सखी देखन को" (मैला आंचल ; पृ.224)

1947 से पहले हमारा एकमात्र उद्‌देश्‍य था आजादी लेकिन आजादी मिलने के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं. लोगों के सपने टूट गए. सामान्य जनता की हालत में कोई परिवर्तन न हुआ. डॉ.रामदरश मिश्र के ये प्रश्‍न आज जन जन के प्रश्‍न हैं कि -
"कहाँ है वह सुराज्य ? कहाँ है वह समता की भावना, गांधीजी जिसका सपना देखते थे ? हत्यारों ने गांधीजी को पहले ही साफ कर दिया. आज मौज से मनमाना करते हैं." (जल टूटता हुआ ; पृ.9)

साहित्य का काम है प्रश्‍न उठाना, जनमानस को झिंझोड़ना और झकझोरना ताकि वह इन प्रश्‍नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए सन्नद्ध हो. संतोष का विषय है कि हमारे साहित्यकार इस दिशा में सचेत हैं.
[स्रवंति : संपादकीय : अगस्त २००९]