रविवार, 29 जनवरी 2023

भारत की एकता की भाषा है हिंदी



भाषा सिर्फ आदान-प्रदान का साधन नहीं है, बल्कि वह प्रयोक्ता समाज की अस्मिता है। भाषा के अभाव में तो हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। भाषा ही वह माध्यम है जिसके कारण हम समाज से जुड़ते हैं। हिंदी भाषा ने आज अपना स्वरूप ऐसा बनाया है कि उसे सबको स्वीकारना ही पड़ा। ‘वह एक कोने की खड़ीबोली नहीं है। वह पुरइन के खड़े पत्ते की तरह से पूरे सरोवर में छा जाने वाली भाषा बन गई है।’ (विद्यानिवास मिश्र, साहित्य के सरोकार पृ.154)। भाषा व्यवहार में एकरूपी या समरूपी नहीं होती। भाषा की यह विविधता उसकी सजीवता का लक्षण है। इसी सजीवता का प्रयोग करके रचनाकार अपनी रचना में रंग लाता है।

ध्यान देने की बात है कि हिंदी की शक्ति उसकी जनपदीय भाषाएँ हैं। इनसे हिंदी निरंतर समृद्ध होती रहती है। हिंदी को सींखचों में जकड़कर रखना संभव नहीं है। शुद्धतावादी सिद्धांत काम नहीं करेगा। ‘भाषा की प्रवाहमयता की कीमत चुकाकर शुद्धता की बात’ सोचना मूर्खता है (विद्यानिवास मिश्र)। ऐसी शुद्धता किस काम की जिसमें न कोई प्रवाह है और न ही संप्रेषण। हिंदी में वह शक्ति निहित है जिसके कारण वह अन्य भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करती चलती है। इससे हिंदी की अस्मिता विस्तृत होती जा रही है। इतना ही नहीं, हिंदी में वह शक्ति है जो एक भाषा को दूसरी भाषा से और एक प्रांत को दूसरी प्रांत से जोड़ती है। हिंदी की एक सीमा में राजस्थान और पंजाब है तो दूसरी सीमा में बिहार। राजस्थान से बिहार तक के लोग अपने घरों में राजस्थानी, ब्रज, बुन्देली, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, मगही आदि क्षेत्रीय भाषाएँ बोलते हैं, लेकिन व्यापक रूप से इनकी मातृभाषा हिंदी है। इन सबकी सामाजिक भाषा हिंदी है। शिक्षा से लेकर कामकाज तक हिंदी में ही होता है। यही विलक्षण बात है।

हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसे आसानी से सब समझ सकते हैं। मिथिला का कोई आदमी पंजाब जाए तो उसे पंजाबी समझने में दिक्कत हो सकती है और इसी प्रकार गुजरात का कोई आदमी असम जाए, तो असमिया समझने में दिक्कत हो सकती है और असम के लोगों को गुजराती समझने में, लेकिन हिंदी से काम चला सकते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है, जहाँ उद्योग फैलता है, वहाँ अलग भाषा समुदाय के लोग आकर बस जाते हैं। इन सबके बीच व्यवहार की भाषा हिंदी बन सकती है। इसीलिए महात्मा गांधी ने भी हिंदी को अपनाने पर बल दिया था। यह एक ऐसी भाषा है जो दूसरी भाषाओं को भी साथ लेकर चलती है। इसीलिए आजादी से पहले हिंदी को अंतःप्रांतीय संपर्क के लिए प्रयोग करने की बात भी आई। अनेक नेताओं ने इसका समर्थन भी किया। उनमें वे नेता प्रमुख थे, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं बल्कि बांग्ला थी। ‘हिंदी भारत की एकता की भाषा’ (रामधारी सिंह 'दिनकर') है। यह इस बात से भी प्रमाणित हो जाता है कि भारत में एक भाषा का साहित्य दूसरी भाषा में अनुवाद के माध्यम से आसानी से पहुँच रहा है और यह काम सबसे ज्यादा हिंदी के माध्यम से हो रहा है।

हिंदी प्रचार-प्रसार आंदोलन का अपना एक महत्व है। यह स्वतंत्रता आंदोलन का ही एक प्रमुख अंग रहा। उस समय महात्मा गांधी ने यह महसूस किया कि जब तक देश के सभी नागरिक एक नहीं होंगे, आपस में संप्रेषण स्थापित नहीं करेंगे तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों को दूर नहीं करेंगे तब तक आजादी की लड़ाई सफल नहीं हो सकती। समाज की विसंगतियों को दूर करने के लिए उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह का रास्ता अपनाया तो आम जनता के बीच संप्रेषण स्थापित करने के लिए एक ऐसी भाषा को सीखने पर बल दिया जिसे सब आसानी से समझ सकते हैं और बोल सकते हैं। यह भाषा संपूर्ण हिंदुस्तान की भाषा है – ‘हिंदी’। उन्होंने हिंदी का आंदोलन प्रारंभ किया। वस्तुतः वे हिंदी के माध्यम से देशवासियों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द कायम करना चाहते थे। गांधी जी से काफी लोग प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप हिंदीतर क्षेत्रों में लाखों लोगों ने हिंदी सीखकर हिंदी का परचम फहराया। “हिंदी प्रचार का काम देशभक्ति का ही काम है। हिंदी को हम इसलिए ऊपर उठा रहे हैं कि उसके साथ सभी भाषाओं का उत्थान हो। हिंदी एक प्रतीक है। असल में हमारा उद्देश्य सभी भाषाओं को ऊपर उठाना है, जिससे यह पूरा देश अपनी भाषाओं में सोच सके और सारी मनुष्य-जाति के लिए भारत की परंपरा में जो संदेश निहित है, उसे अपनी भाषाओं में उछाल सके।” (रामधारी सिंह 'दिनकर', संस्कृति, भाषा और राष्ट्र, पृ. 200)।

पड़ने लगती है पीयूष की शिर पर धारा।
हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा।
बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती।
कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती।
आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नाम ही।
इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही। (अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’)

मधुकरी के कवि : नरेश मेहता


वहन करो
ओ मन! वहन करो,
सहन करो पीड़ा!!

सृष्टिप्रिया पीड़ा है
कल्पवृक्ष–
दान समझ, शीश झुका

स्वीकारो–
ओ मन करपात्री! मधुकरि स्वीकारो!!
वहन करो, सहन करो,
ओ मन! वरण करो पीड़ा!!

ये पंक्तियाँ मधुकरी के कवि नरेश मेहता के अवचेतन को अंकित करने में सक्षम हैं। नरेश मेहता की कविताओं में इस बिंब को अनेक स्तरों पर देखा जा सकता है। वे परंपरा और आधुनिकता को एक साथ लेकर चलने वाले कवि हैं। वे एक सजग प्रयोगशील सर्जक के रूप में अपने आपको प्रतिष्ठित कर चुके थे। करुणाशंकर उपाध्याय का कहना है कि “नरेश ने काव्य के क्षेत्र में ‘दूसरा सप्तक’ से लेकर ‘मेरा समर्पित एकांत’ तक की यात्रा की है तो उपन्यास में ‘प्रथम फाल्गुन’ से लेकर ‘वह नदी यशस्वी है’ के किनारे तक जा पहुँचा है।” (आधुनिक कविता का पुनर्पाठ, पृ.175)। इस यात्रा के दौरान नरेश मेहता कहानियों और नाटकों से भी गुजरे।

‘बनपाखी सुनो’, ‘बोलने दो चीड़ को’ में संकलित कविताओं में कवि मन प्रकृति के निकट दिखाई देता है। प्राकृतिक सौंदर्य के अनेक उपमान उनकी कविताओं में देखे जा सकते हैं। ‘बाँसों के अनंत वृक्षों वाले/ उस अरण्य में’ कवि अपने आपको एक अनाम वानीर-वृक्ष घोषित करता है। उनकी कविताओं में जहाँ पीले फूल कनेर के दिखाई देते हैं वहीं दूसरी ओर नीलम वंशी से कुंकुम के स्वर गूँज उठते हैं। वसुधा मंत्रोच्चार से वासंती रथ का आह्वान करती है तो अमराई में दमयंती-सी पीली पूनम काँप उठती है। शॉल-सा कंधों पर पड़ा फाल्गुन चैत्र-सा तपने लगता है तो बैलों की घंटियाँ बोलने लगती हैं। पिघलते हिमवानों के बीच दूब का वर्ण खिल उठता है, इंद्रलोक की सीमा केसर के जल से सिंचित हो उठतीहै। उदयाचल से किरन-धेनुओं को हाँकता हुआ प्रभात का ग्वाला दीखता है। उनकी कविताओं में वैश्वानरी-गंध, गायत्री छंद, सावित्रियों के अरण्य-रास, औषधियों का आचमन, हिरण्यगर्भ, आकाशगंगा, पराब्रह्माण्ड, महापिण्ड आदि अनेक दार्शनिक एवं मिथकीय बिंबों को भी देखा जा सकता है। वे वस्तुतः प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से मनुष्य को गतिशील होने की प्रेरणा देते हैं।

मनुष्यता की रक्षा कवि नरेश मेहता का परम कर्तव्य है। वे हर व्यक्ति के भीतर के क्रंदन को लिपिबद्ध करना चाहते हैं। कमल किशोर गाइन्का से बात करते हुए उन्होंने कहा कि “विज्ञान और राजनीति ने मनुष्य को अकेला छोड़ दिया है। आज मनुष्य की जगह उत्पादन को ‘रिफाइंड’ करने की चेष्टा की जा रही है। इस तथाकथित आधुनिकता ने मनुष्य को न तो उदात्त बनाया है और न आनंद प्रदान किया है।” (मेरे साक्षात्कार, पृ. 173)। वे यही मानते थे कि सभी मानवीय दुखों का मूल कारण भ्रष्ट राज्य व्यवस्था है – “मानवीय उदात्तताओं और करुणा के प्रतीक/ धर्म के प्रतिपालक नहीं हो सकते।”

प्रतीक्षा करो पुनः मनुष्य होने की : नरेश मेहता

सामने वाला यदि आवेग में
पशु हो गया हो
तो विवेक के रहते
प्रतीक्षा करो
उसके पुनः मनुष्‍य होने की

यह विचार नरेश मेहता का है। वे पीड़ित और शोषित मानव के बारे में सोचते थे। महलों में रहने वालों से उनके कवि का नाता नहीं। वे अपनी अनुभूतियों और अनुभवों के विस्तृत फलक को अपनी कृतियों में अंकित करते हैं। उनकी रचनाओं में मानवता के प्रति प्रेम और जीवन की वास्तविकताओं को देखा जा सकता है। उनके अनुसार ‘विवेकहीनता मनुष्य को पशु बना देता है’। विवेकशून्यता व्‍यक्‍ति के भीतर विचारशून्‍यता का अंधा कारागार निर्मित कर देती है। विडंबना है कि ‘व्‍यवस्‍था का मुकुट धारण करते ही किसी भी व्‍यक्‍ति का मनुष्‍यत्‍व नष्‍ट हो जाता है’।

नरेश मेहता मानवीय गुणों को महत्व देने वाले रचनाकार थे। वे इस बात पर बल देते थे कि इतिहास मानवीय उदात्‍तता से लिखा जाना चाहिए, न कि खड़ग से। उन्होंने ‘प्रवाद पर्व’ में कहा है कि ‘मानवीय स्वातंत्र्य/ मानवीय भाषा और/ मानवीय अभिव्‍यक्‍ति के/ प्रतिइतिहास का सामना/ वैसे ही/ मानवीय प्रतिगरिमा के साथ/ करना होगा, लक्ष्‍मण!/ प्रतिइतिहास को इतिहास से नहीं/ विनय से स्‍वीकारना होगा।’ यदि कहें कि नरेश मेहता मानववादी रचनाकार हैं तो गलत नहीं होगा। वे ‘प्रतिबद्धता’ शब्द को महज एक नारेबाजी के रूप में देखते हैं और कहते हैं कि प्रतिबद्धता एक राजनैतिक शब्द है। अतः वे इस शब्द से जुड़ने के लिए तैयार ही नहीं थे। डॉ. कमल किशोर गोयनका से बात करते समय उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि “मनुष्य की नियति यही है कि वह मनुष्यता और मिट्टी के आकर्षण में बँधा रहे। पृथ्वी और उस पर रहने वाला हमारा मानवीय समाज हमारी नियति है, अतः उसके लिए ‘प्रतिबद्धता’ जैसी एकांगी नारेबाजी की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं किसी भी कीमत पर ‘प्रतिबद्धता’ शब्द से जुड़ने को तैयार नहीं हूँ।” (नरेश मेहता, मेरे साक्षात्कार, पृ. 173)।

हम नरेश मेहता के कवि रूप से भली भाँति परिचित हैं। उनके गद्यकार रूप के बारे में प्रायः बहुत कम चर्चा होती है। जिस प्रकार कवि के रूप में वे सफल हुए, उसी प्रकार गद्यकार के रूप में भी वे सफल थे। वे लेखन को अनभिव्यक्त आइसबर्ग की टिप मानते हैं जो हमें दिखाई देती है। उनकी मान्यता है कि “जीवन की अनुभूति या अनुभवों के अतल जल के अंधकार में गहरे पैठे आइसबर्ग का वह विशाल वास्तविक स्वत्व हम कभी नहीं देख पाते हैं जो उस टिप को निरभ्र व्यक्त किए होता है। निश्चित ही वह टिप नहीं बल्कि ठंडे, अगम जलों में डूबा पसरा हिमखंड ही आइसबर्ग का वास्तविक सृजनात्मक स्वत्व है।” (नरेश मेहता, हम अनिकेतन, पृ.9)। सृजनात्मक क्षमता मनुष्य के भीतर जल में डूबा हुआ वह हिमखंड है जो दिखाई नहीं देता। उसे व्यक्त होने के लिए सही वातावरण चाहिए। ‘जीवन से अनाविल रूप में निबद्ध यह सृजनात्मकता’ ही नरेश मेहता के लेखे जीवन है जिसे धारण करना मनुष्य की नियति है, और भोगना प्रकृति। लेकिन जीवन की सृजनात्मक सत्ता या स्वरूप को ‘पूर्ण रूप’ से अभिव्यक्त करना असंभव है। सृजन और लेखन के बीच निहित सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि “जीवन की अनभिव्यक्त तथा अकथनीय सत्ता या स्वरूप, सृजन है। सृजन अनभिव्यक्त सत्ता है। लेखन, सृजन का संलाप रूप है। इसलिए सृजन को नहीं बल्कि लेखन को भाषा, अभिव्यक्ति, श्रोता, देश और काल सभी कुछ चाहिए होता है।” (वही, पृ.28)।

मनुष्य का जीवन अनुभव आधारित है। अनुभव देश-काल-वातावरण से परे होता है। वह तो बस घटित होता है। “वह तो एक निपात की भाँति केवल घटित होना जानता है। वह न तो सांसारिक है, न किसी प्रकार का निषेध।” (वही, पृ.25)। नरेश मेहता साहित्य को अपनी दृष्टि से समझना चाहते थे और अपना एक अलग पथ निर्मित करना चाहते थे। उनका जीवन संघर्षमय रहा। अतः वे जीवन के मूल्य को पहचानते थे। उनकी रचनाओं से गुजरते समय इस बात को महसूस किया जा सकता है।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ - रामावतार त्यागी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है
पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है
आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है
(ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है, रामावतर त्यागी)

इन पंक्तियों के रचनाकार हैं सुप्रसिद्ध गीतकार रामावतार त्यागी (17 मार्च, 1925-12 अप्रैल 1985)। उनका जन्म मुरादाबाद जिले (उत्तर प्रदेश) के कुरकावली ग्राम में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा 10 साल की उम्र में शुरू हुई थी। हिंदी साहित्य जगत में वे ‘पीड़ा के गायक’ के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन वे आस्था और जिजीविषा के कवि भी हैं, जो इस दुनिया को बेहतर बनाने के सपने देखा करते थे। रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि “दर्द की छोटी-सी टीस, मगर, पता नहीं, वह कहाँ से उठती और कहाँ जाकर विलीन हो जाती है। उमंग का एक मतवाला झोंका जो आता तो बड़ी नरमी से है, मगर, सारी वाटिका के भीतर एक सिहरन-सी दौड़ जाती है। किसी नन्हीं उंगली की एक हल्की-सी चोट पड़ती तो एक तार पर है, किंतु जीवन-वीणा के सारे तार एक साथ झनझना उठते हैं।” (रामधारी सिंह दिनकर, भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ. 6)। जी हाँ, रामावतार त्यागी की कविताओं में वह शक्ति है जो पाठकों के हृदय को झंकृत कर देती है।

रामावतार त्यागी की काव्य कृतियों में नया खून (1953), आठवाँ स्वर (1958), मैं दिल्ली हूँ (1959), सपना महक उठे (1965), गुलाब और बबूल वन (1973), गाता हुआ दर्द (1982), लहू के चार कतरे (1984), गीत बोलते हैं (1986, मरणोपरांत प्रकाशित) आदि उल्लेखनीय हैं। उन्होंने महाकवि कालिदास रचित ‘मेघदूत’ का काव्यानुवाद भी किया और कविता के अलावा उन्होंने उपन्यास (समाधान और राम झरोखा), पत्र साहित्य (चरित्रहीन के पत्र) और कहानियाँ (राष्ट्रीय एकता की कहानियाँ) भी रचीं। समाज (मासिक) और प्रगति (त्रैमासिक) पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

भावुक गीतकार रामावतार त्यागी अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति थे। उनके गीतों में उनके जीवन के अनुभवों को देखा जा सकता है। वे अपनी अनुभूतियों को गीतों में पिरोते हैं। उनके व्यक्ति रूप और कवि रूप में से किसी एक की उपेक्षा करके दूसरे को समझ ही नहीं सकते। कहने का अर्थ है कि दोनों एक-दूसरे में इस तरह समाहित हैं कि एक के अभाव में दूसरा अधूरा लगेगा। उनके व्यक्तित्व के संबंध में डॉ. शेरजंग गर्ग लिखते हैं कि “पहली मुलाकात में कठिन-सा लगने वाला व्यक्तित्व जब खुल जाता था, तो बहुत जल्दी आत्मीय बन जाता था। बात-बात पर जुमले कसना, बहुत धीमे-धीमे मुस्कराते हुए हँसना और वेशभूषा में कतई सामान्य-सा लगना त्यागी के व्यक्तित्व को बहुत असामान्य बनाते थे।” (सं. शेरजंग गर्ग, भूमिका, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ.11)। वे यह भी कहते हैं कि उनके काव्य पाठ में भी कोई विशेष आकर्षण नहीं होता था, लेकिन उनकी कविताओं और गीतों में निहित भावुकता, पीड़ा और संघर्ष की बानगी अंतर्मन को झकझोरने में समर्थ थीं।

रामावतार त्यागी हमेशा नए प्रयोग करते हैं। डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय यह मानते हैं कि त्यागी की कविताओं में मानव मूर्ति मुस्कुराकर उभरती है। वे आगे यह कहते हैं कि इसके निर्माण में समष्टिमूलक नए मानव मूल्य हैं। (अति-आधुनिक हिंदी काव्य में यथार्थवाद, विश्वंभरनाथ उपाध्याय, समालोचक, फरवरी 1959, पृ.117)।

त्यागी जी कह उठते हैं कि-

मेरे गीत रहें जीवन भर कारावास भोगतें,
लेकिन मैं गुमराह स्वर्ण को अपनी कलम नहीं बेचूँगा!

उक्त पंक्तियों को पढ़ते समय भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ’ अनायास ही स्मरण हो आई। उसमें मिश्र जी कहते हैं - 'जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ।/ मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ;/ मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत बेचता हूँ।’ कहा जाता है कि मिश्र जी ने पश्चात्ताप स्वरूप इन पंक्तियों को रचा था। साहित्य की दुनिया में यह कविता आत्म व्यंग्य का उदाहरण बन गई। त्यागी जी भी आहत होकर पलटवार के रूप में लिखा है -

सुन लो गीत बेचने वाले
ओ सौदागर, ओ व्यापारी
अपने भरे भरे लोचन से तुमने कितने गीत लिखे हैं?
शब्दों के रेशमी नमूने
देख लिए अब माल दिखाओ
कोई गीत जड़ें हो तुमने
जिस पर तीनों कला दिखाओ
बातें करते हुए पवन से तुमने कितने गीत लिखे हैं?

रामावतार त्यागी को जो नजदीक से जानते हैं, वे उनके व्यक्तित्व के बारे में सटीक रूप से कह सकते हैं। वे अक्खड़, तुनक मिजाज और स्वाभिमानी व्यक्ति थे। अतः वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि -

मेरी खुशियों को चाहे जब जिंदा मरघट में दफना दो,
लेकिन मैं बदचलन पतन को अपना जनम नहीं बेचूँगा।
दीपक बिक सकता है जिसका
अंतर ज्योतिर्मान नहीं है
पर अंगारे को खरीदना
दुनिया में आसान नहीं है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें रामावतार त्यागी के गीत बेहद पसंद हैं। “उसके रोने, उसके हँसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहाँ तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है, जो मन को मोह लेती है।” (भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ. 6)। त्यागी की कविताओं पर चर्चा करते हुए दिनकर जी ने तीन बातों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। निःसंदेह ये बातें रामावतार त्यागी की कविता को समझने में सहायक सिद्ध होंगी -

● महादेवी और बच्चन ने जो परंपरा चलाई वह जनता को अब भी पसंद है। वही परंपरा नीरज, त्यागी, वीरेंद्र, राही आदि कवियों के भीतर से अपना प्रसार कर रही है।

● बच्चन तक हिंदी गीतों के छंद केवल हिंदी के छंद से लगते थे, अब वे उर्दू के पास पहुँच रहे हैं। भाषा भी इन गीतों की हिंदुस्तानी रूप ले रही है। कहाँ है हिंदी में रिवाइवलिज़्म? यह तो रिवाइवलिज़्म के ठीक विपरीत चलने वाली धारा है।

● तीसरी बात यह है कि जिस ओर से प्रयोगवादी कवि अपना नूतन प्रयोग कर रहे हैं, उसी ओर से इस पीढ़ी के अनेक नव कवि गीतों में अपना अंतर उंडेल रहे हैं। यह ठीक है कि नए आलोचकों ने अपनी आशा प्रयोगवाद से बाँध रखी है, किंतु, जनता का प्रेम आज भी इन गीतों पर ही बरस रहा है। (रामधारी सिंह दिनकर, भूमिका, आठवाँ स्वर, रामावतार त्यागी, पृ.6-7)।

रामावतार त्यागी के गीतों को ध्यान से पढ़ने पर यह बात स्पष्ट होती है कि वे दुनिया वालों को चुनौती दे रहे हैं। वे समाज के जटिल बंधनों को तोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। वे कहते हैं -

मैं तो तोड़ मोड़ के बंधन
अपने गाँव चला जाऊँगा
तुम आकर्षक संबंधों का,
आँचल बुनते रह जाओगे।

वस्तुतः हम सब प्रेम के दो पक्ष - वियोग और संयोग - के बारे में काफी पढ़ चुके हैं। मध्यकालीन कविताओं में इन दोनों रूपों को देख भी चुके हैं। पर प्रेम का एक और पक्ष है - विश्व शांति का। जिंदगी से प्रेम करने वाला व्यक्ति युद्ध का विरोध अवश्य करेगा, लेकिन जहाँ युद्ध अनिवार्य है वहाँ वह जरूर गुहार लगाएगा, जनता को चेताएगा यह कहकर कि ‘लेकिन युद्ध तो अनिवार्य है।’ रामावतार त्यागी का संवेदनशील हृदय उस जन-मानस के साथ है जो सबके लिए अन्न पैदा करता है, पर खुद दो जून रोटी के लिए कर्ज के तले दब जाता है। ‘किसान दिवस’ (23 दिसंबर) पर लिखी उनकी एक कविता का अंश देखें -

जुलूसों और नारों से।
प्रदर्शन या प्रचारों से,
न कोई देश जीता है,
सभाएँ बंद कर, चल खेत में या कारखानों में,
सिपाही के लिए कपड़े, जवानों के लिए रोटी,
सभाएँ बन नहीं सकती, लगी है जान की बाजी,
यह तो वक्त है कुछ काम कर, कुछ काम कर प्यारे,
विवादों को उठाने से,
न कोई देश जीता है

रामावतार त्यागी अपने अनूठे तेवर और अंदाज के लिए जाने जाते हैं। वे निराशा की स्थिति में भी आशा का संचार करवाना चाहते हैं। इसीलिए कह गए -

ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
इक हसरत थी कि आँचल का मुझे प्यार मिले
मैंने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले

रामावतार त्यागी के गीतों में उनके जीवन-दर्शन को भी देखा जा सकता है। इनके अलावा किसी और कवि या गीतकार यह कहने का साहस नहीं कर पाया कि

मुझको पैदा किया संसार में दो लाशों ने
और बर्बाद किया क़ौम के अय्याशों ने
तेरे दामन में बस मौत से ज़्यादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
जो भी तस्वीर बनाता हूँ बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

‘जिंदगी और तूफान’ फिल्म के गीत ‘ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है’ ने रामावतार त्यागी की प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए थे। कहा जाता है कि त्यागी ने इसके बाद फिल्मों के लिए गीत लिखना स्वीकार नहीं किया। फिक्र तौंसवी का यह कथन उल्लेखनीय है कि “त्यागी ने फिल्मी दुनिया को एक हसीन और दिलचस्प गीत देकर तलाक दे दिया। कहने लगा, हम शायर हैं भड़भूँजे नहीं है। और बंबई का फिल्म स्टार सौदागरों का स्टार है। वह गुड, बेसन, चीनी, मूँगफली और शायरी सबको मार्केट का माल समझते हैं। मैं अब कभी उधर का रुख नहीं करूँगा।” (सं. शेरजंग गर्ग, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ. 7)

कहने की जरूरत नहीं कि दर्द किसी भी व्यक्ति को इस तरह माँजता है कि वह औरों के दुख-दर्द को समझने में समर्थ हो जाता है। इतना ही नहीं, उसे उनकी पीड़ा के सामने अपनी पीड़ा बहुत छोटी नजर आती है-

हारे थके मुसाफिर के चरणों को धोकर पी लेने से
मैंने अकसर यह देखा है मेरी थकन उतर जाती है।
कोई ठोकर लगी अचानक जब-जब चला सावधानी से
पर बेहोशी में मंजिल तक जा पहुँचा हूँ आसानी से
रोने वाले के अधरों पर अपनी मुरली धर देने से
मैंने अकसर यह देखा है, मेरी तृष्णा मर जाती है॥

आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने रामावतार त्यागी को ‘गीतों के राजकुमार’ कहकर संबोधित किया है। सच में वे गीतों के राजकुमार ही हैं। उन्होंने नए समाज के निर्माण में अपनी भूमिका को पहचान लिया था -

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूँ;
मत बुझाओ!
जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी!

×××

मैं जहाँ धर दूँ क़दम वह राजपथ है;
मत मिटाओ!
पाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!

×××

मैं बहारों का अकेला वंशधर हूँ
मत सुखाओ!
मैं खिलूँगा, तब नई बगिया खिलेगी!

रामावतार त्यागी के गीतों के संबंध में रमेश गौड़ कहते हैं कि “त्यागी के गीत किसी व्यक्ति विशेष का विलाप न होकर पूरे समाज की आज की स्थिति को वाणी देते हैं। और जो लोग मुझसे सहमत नहीं हैं, उनसे अत्यंत विनम्र शब्दों में पूछना चाहता हूँ कि जब वह कहता है, ‘ठोकर सह बोलूँ नहीं इतना मुझे संयम न दो’ या ‘मेरे अधर न कम झुलसे हैं मेरी प्यास न हरगिज कम हैं’ तो क्या वह एक व्यक्ति के रूप में बोलता है?” (सं. शेरजंग गर्ग, हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी, पृ.9)। सच भी है, उनके गीत व्यक्तिगत गाथा नहीं, बल्कि ‘जिंदगी निर्माण की जीवन-कथा है।’

रामावतार त्यागी के गीतों में मानव जीवन से जुड़े तमाम आयामों को देखा जा सकता है। एक ओर उनके गीतों में शहर का कोलाहल है तो दूसरी ओर गाँव की स्मृतियाँ -

तन बचाने चले थे कि मन खो गया
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया
घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही
और सब कुछ है वातावरण खो गया
यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया
गाँव का जो दिया था वचन खो गया

रामावतार त्यागी यह जानते हैं कि इस संसार में मनुष्य को भी बेजान वस्तु की तरह खरीदने की होड़ लगी हुई है। ऐसे में मनुष्य का ईमान डगमगाने लगेगा तो आश्चर्य की बात नहीं है। पर त्यागी जी कहते हैं -

दूकानों में होड़ लगी है
ईमानों को खरीदने की
रेगिस्तानों ने जिद पकड़ी
उद्यानों को खरीदने की
मेरे दर्पण को यदि संभव हो तो खंड खंड कर डालो
लेकिन मैं तन की इच्छा पर मन का नियम नहीं बेचूँगा।

त्यागी जी के गीतों में जहाँ एक ओर पर-दुख कातरता है, मनुष्यता है, संवेदनशीलता है, वहीं दूसरी ओर उनके गीतों में आस्था और जिजीविषा है। कवि का आत्मविश्वास यह कहने में संकोच नहीं करता कि-

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाए अपनी ही नजर में
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए

त्यागी जी की कविताओं में जीवन संघर्ष के साथ-साथ भ्रष्ट तंत्र के प्रति विद्रोह भी मुखरित है। जहाँ मानव विरोधी शक्तियाँ प्रबल होती जा रही हैं वहाँ गीतकार बेईमान समय के सामने अपना अहं नहीं बेचना चाहता और दृढ़ संकल्प लेता है, यह कहकर कि-

मेरे सपनों को सूली पर लटका दो तुम बड़ी खुशी से
पर मैं बेईमान समय को अपना अहं नहीं बेचूँगा।

×××

सूनी काल कोठारी में ही सारी उम्र बिता दूँगा
लेकिन किसी मोह को अपने कवि का धरम नहीं बेचूँगा।

समाज में चारों ओर व्याप्त विसंगतियों और विद्रूपताओं को देखकर रामावतार त्यागी आक्रोश से भर उठते हैं और घोषित करते हैं -

देश के समुद्र में बूँद-बूँद डाल दो
दुश्मनों को देश की जमीन से निकाल दो
तेज और भाइयो तेज करो आग को
आंधियाँ न सोख लें देश के चिराग को
भाल से खरोंच दो स्याह-स्याह दाग को
नाच-नाच युद्ध में झूम-झूम ताल दो,
दुश्मनों को देश की जमीन से निकाल दो

मानव मन की गहन अनुभूतियों को गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाले रामावतार त्यागी जिजीविषा और आस्था के कवि हैं। वे आत्मविश्वास के साथ मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध रहे और आजीवन एक ऐसे इंसान की तलाश करते रहे जो-

मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

कहना ही होगा कि रामावतार त्यागी आस्था, जिजीविषा, संवेदना, स्वाभिमान, देशप्रेम, मानवीय गंध की प्यास, मूल्य, गाँव, शहर, प्रेम, विरह, पीड़ा, संघर्ष, रूढ़िवादी मानसिकता के प्रति विद्रोह आदि सुंदर मानकों को गीत-माला में पिरोने वाले रचनाकार हैं। समझौतों के शहर में रहने के बावजूद उन्होंने अपने अंदर गाँव को जीवित रखा। वे भाग्य पर नहीं, कर्म पर विश्वास रखते हैं। उनके अनुसार ‘बनाने के लिए हमने स्वयं किस्मत बनाई है’ और इस राह में ‘विफलता मात्र पूँजी है, निराशा ही कमाई है’ तथा ‘जलन से दोस्ती है’ और ‘उलझनों से आशनाई’। उनकी लड़ाई किसी और से नहीं बल्कि अपने अस्तित्व से ही है। उनका कवि मन न विरोधों की चिंता करता है और न ही बाधा के पग पर शीश धरता है। वह उन हमदर्दों से डरता है जो पीठ पीछे वार करता है। साफ दिखाई देने वाले शूलों से भयभीत नहीं है, पर ‘फूलों की उत्कंठित मुसकानों से डरता’ है; ‘राम के तन से मिट्टी नोचकर रावण की मूर्ति गढ़ने वालों’ से डरता है! ‘दर्द तो वह अनमोल धन है, जो सबके भाग्य में नहीं होता।’ त्यागी जी ऐसे दर्द को गले लगाते हैं जो इंसान को इंसान बनाए रखने में सहायक हो। वे बार-बार यह कहते हैं कि-

पूरी तरह टूटे बिना
दुख का मजा आता नहीं
आधी तड़प से गीत भी
पूरा लिखा जाता है।

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संदर्भ ग्रंथ

1. त्यागी, रामावतार (1958 प्रथम आवृत्ति). आठवाँ स्वर. दिल्ली : फ्रैंक ब्रदर्स एंड कंपनी

2. त्यागी, रामावतार (1959). मैं दिल्ली हूँ. दिल्ली : साहित्य संस्थान

3. त्यागी, रामावतार (1986 ). गीत बोलते हैं. दिल्ली : आत्माराम एंड संस

4. सं. गर्ग, शेरजंग (2006). हमारे लोकप्रिय गीतकार रामावतार त्यागी. नई दिल्ली : वाणी

5. प्र. सं. शर्मा, रामविलास (फरवरी 1959). समालोचक. द्वितीय वर्ष. अंक 1. जयपुर