गुरुवार, 12 जुलाई 2012

[पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का छठा दिन] मीडिया-साहित्य-सिनेमा-उत्तरआधुनिकता



11/07/2012 की सुर्खियाँ
·        ‘साहित्य और मीडिया’ तथा ‘उत्तरआधुनिकता और हिंदी सिनेमा’ पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद के अध्यक्ष प्रो.ऋषभ देव शर्मा का व्याख्यान   
·        ‘मीडिया के सामाजिक सरोकार’ तथा ‘मीडिया और भारतीय प्रजातान्त्रिकता’ पर श्री वेंकटेश्व विश्वविद्यालय, तिरुपति के अध्यक्ष प्रो.आई.एन.चंद्रशेखर रेड्डी का व्याख्यान  
  
पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का छठा दिन.
पांच दिनों से हम लगातार साहित्य, मीडिया और रंगमंच के साथ साथ सिनेमा के बारे में काफी कुछ सुन रहे हैं और कुछ नाटक और सिनेमा क्लिपिंग्स भी देख रहे हैं. पर हम यह नहीं समझ पा रहे थे कि किस तरह सिनेमा या नाटक को इंटरप्रेट करना है. हम सभी प्रतिभागी यही आशा कर रहे थे कि आज के व्याख्यान से हम यह जरूर जान जाएँगे कि सिनेमा को किस तरह से इंटरप्रेट किया जा सकता है क्योंकि आज उत्तरआधुनिकता और सिनेमा पर व्याख्यान है.प्रो.ऋषभ देव शर्मा जी का व्याख्यान सुनने के बाद हम सब को यही लगा कि सर के व्याख्यान और दो दिन लगातार होते तो हम और भी लाभान्वित होते. विषय ही कुछ ऐसा है कि इसे महज तीन – चार घंटों में नहीं समेटा जा सकता है. फिर भी सर ने व्यवस्थित ढंग से स्लाइड शो के साथ काफी कुछ हमें समझा दिया है. जब कुछ प्रतिभागियों ने मुझसे यह कहा कि हमें भ्रम पैदा हो रहा था कि हम यहाँ ऋषभ देव शर्मा जी को देख रहे हैं या फिर दिलीप सिंह जी को तो मुझे बहुत ही अच्छा लगा क्योंकि दोनों ही मेरे गुरु हैं और दोनों को एक साथ फील करने का अनुभव ही एक छात्र के लिए अनूठा होता है.
      
प्रो.ऋषभ देव शर्मा के व्याख्यान का सार संक्षेप 

(1) साहित्य, मीडिया और नाटक – ये तीनों ऐसे शब्द हैं जो सुनने के लिए भले ही अलग ध्वनित हों लेकिन ये वास्तव में एक ही हैं जैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर. यहाँ मीडिया से अभिप्राय है व्यापक जनसमूह को संबोधित माध्यम. जनता  तक पहुँचने के लिए ये सभी  माध्यम है. जनसमूहों तक पहुँचने के  माध्यमों में एक साहित्य भी है. कई तरह के संचारों की बात की जाती है – जैसे एकलसंचार, दो व्यक्तियों के बीच का संचार, समूह संचार और जनसंचार. किसी सूचना को या सामग्री को एक साथ व्यापक जन तक पहुंचाना वास्तव में जनसंचार का उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य साहित्य का भी है. रचनाकार साहित्य के माध्यम से जो कुछ कहता है उसे व्यापक जनसमूह तक पहुँचाने के लिए वह रंगमंच या किसी मीडिया को अपना सकता है. अतः यह कहा जा सकता है कि जनसंचार लोकतंत्र की ओर अग्रसर होता है. आज मीडिया के विस्फोट का समय है. उसे ज्ञान या शक्ति का माध्यम माना जा सकता है. कम्यूनिकेशन के द्वारा आज न्यू मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) के द्वारा बहुत ही तीव्र गति से वैश्विक संचार संभव हो रहा है. इस न्यू मीडिया के पंखों पर बैठकर ही ग्लोलाइजेशन तथा उत्तरआधुनिकता ने भारत में प्रवेश किया है. इस से एक आभासी ख़तरा महसूस किया गया कि मीडिया के आने से साहित्य का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. पर यह गलत है. साहित्य मीडिया के माध्यम से और भी निख सकता है और निखरा भी है. उसे अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त होंगी और हो भी रही हैं. मीडिया ने रचनाकार को सूचनाएं प्रदान की है और अब रचनाकार का दायित्व बनता है कि वह इन तमाम सूचनाओं को कैसे अनुभूति में बदलकर एक नया सृजन करता है. अज्ञेय भी कहते हैं कि अनुभव को ज्यों का त्यों रचना में नहीं डालना चाहिए. पर उस अनुभव को अनुभूति में पककर अभिव्यक्ति के रूप में ढलना होगा. यही बड़ी चुनौती है रचनाकार के सामने.

(2) उत्तरआधुनिकता और सिनेमा पर प्रकाश डालते हुए प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि उत्तरआधुनिकता यह मानकर चलती है कि किसी रचना का अंतिम पाठ नहीं होता. परिपाटी के पट परिवर्तन का नाम ही आधुनिकता है. उत्तरआधुनिकता हमें पाठ या टेक्स्ट की संकल्पना और पाठ विश्लेषण की पद्धति देती है. बहुपाठीयता, बहुकेंद्रीयता आदि उत्तरआधुनिकता के प्रमुख लक्षण हैं. हमेशा अंतरपाठ, सहपाठ और पुनर्पाठ की संभावना बनी रहती है. सिनेमा के संदर्भ में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि रिड्ले स्कॉट की ‘ब्लेड रनर’ (1982) को प्रथम उत्तरआधुनिक सिनेमा माना जाता है. भारतीय सिनेमा यों तो अभी पूरी तरह से उत्तरआधुनिक नहीं है पर उत्तरआधुनिकता के कुछ लक्षण अवश्य अनेक फिल्मों में दिखाई देते हैं. इसके उदाहरण के रूप में ‘हे राम’ (2000) को  हिंदी की पहली उत्तर आधुनिक फिल्म के रूप में ले सकते हैं. पुराने महावृत्तांत के टूटने के रूप में उत्तरआधुनिकता को देखा जा सकता है. हिंदी सिनेमा के कई  उत्तरआधुनिक लक्षण हैं जैसे -  
  
1.      गहराई का अभाव (Depthlessness)
2.      रिक्त पैरोडी (Blank parody / Empty pastiche)  
3.      भव्य सम्मूर्तन (The Figural)
4.      खंड खंड पहचान (Fragmentation of Identity)
5.      आत्मप्रतिबिंबन (Self  Reflexivity)
6.      अंतरपाठीयता (Inter textuality)
7.      उत्तर यथार्थवाद (Hyper Realism)
8.      अवमिश्रण (Hybridity)
9.      समांतर दर्पण तकनीक (Mise-en-abyme)
10.  सीमाओं का धुंधलका (Boundary Blurring)
11.  महावृत्तांतों की विरचना (Deconstruction of Meta narratives)
12.  वर्जित की प्रस्तुति (Presenting the un-presentable)

अंततः उन्होंने यह कहा कि बॉलीवुड हॉलीवुड की पैरोडी है.

प्रो. ऋषभदेव शर्मा के सान्निध्य में प्रतिभागीजन
और डॉ.करन सिंह ऊटवाल [समन्वयक]

प्रो.आई.एन.चंद्रशेखर रेड्डी के व्याख्यान का सार संक्षेप
मीडिया के सामाजिक सरोकार तथा मीडिया और भारतीय प्रजातंत्र पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए प्रो.आई.एन.चंद्रशेखर रेड्डी ने कहा कि भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में मीडिया आज हर क्षेत्र में अपना एक सुनिश्चित स्थान बना चुका है. वह प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशन बन चुका है. इसलिए वह अपने ढंग से काम करता है. आज कल मीडिया एक विशेष अभिजात्य वर्ग के लिए काम कर रहा है. इस संबंध में प्रसिद्ध समाजशास्त्री स्टुअर्ट हाल का कथन द्रष्टव्य है. उन्होंने कहा कि आज के समाचार पत्र अभिजात्य वर्ग के सदस्यों के कार्यों, स्थितियों तथा विशेषताओं से भरे रहते हैं. प्रजातंत्र में मीडिया को जरूरतमंद लोगों का समर्थन करना चाहिए और उसे प्रतिबद्धता, पक्षधरता और एकपक्षता से मुक्त रहना चाहिए. 


इस  पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के संबंध में गत दिनों की जानकारी के लिए देखें-

2 टिप्‍पणियां:

ऋषभ देव शर्मा ने कहा…

इतने विस्तृत कवरेज के लिए धन्यवाद. आशीर्वाद भी.

बलविंदर ने कहा…

सर्वप्रथम मैं मानू के सभी सदस्यों को नाटक पर पुनश्चर्या कार्यकर्म करवाने के लिए धन्यवाद व् बधाई देती हूँ . साथ ही डॉ .जी .नीरजा के माध्यम से प्रो . ऋषभ देव शर्मा के व्याख्यान से उताराधुनिकता और आज के समय के यथार्थ को एक कैप्सुल्नुमा रूप में प्रस्तुत कर देना वाकेही काबिले तारीफ हैं जिसके लिए में प्रो. ऋषभ देव शर्मा व् डॉ. जी .नीरजा को बहुत -बहुत बधाई देती हूँ .